भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 28 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 3.28 · तत्त्ववित्तु महाबाहो
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ |
guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate ||
हिन्दी अनुवाद
पर हे महाबाहो, जो गुणों और कर्मों के अलग-अलग विभाग का तत्त्व जानता है, वह समझता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, और इसलिए आसक्त नहीं होता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 3.28 का अर्थ क्या है?
पर हे महाबाहो, जो गुणों और कर्मों के अलग-अलग विभाग का तत्त्व जानता है, वह समझता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, और इसलिए आसक्त नहीं होता।
भगवद्गीता 3.28 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।