भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 3.15 · कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam |
tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam ||
हिन्दी अनुवाद
जानो कि कर्म ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न होता है और ब्रह्म अविनाशी परमात्मा से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 3.15 का अर्थ क्या है?
जानो कि कर्म ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न होता है और ब्रह्म अविनाशी परमात्मा से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
भगवद्गीता 3.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।