भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.16 · एवं प्रवर्तितं चक्रं यः

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥

evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ |
aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati ||

हिन्दी अनुवाद

हे पार्थ, जो इस संसार में इस प्रकार घूमते चक्र के अनुसार नहीं चलता, जो इन्द्रियों के सुख में रमा हुआ पापमय जीवन जीता है, वह व्यर्थ ही जीता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.16 का अर्थ क्या है?

हे पार्थ, जो इस संसार में इस प्रकार घूमते चक्र के अनुसार नहीं चलता, जो इन्द्रियों के सुख में रमा हुआ पापमय जीवन जीता है, वह व्यर्थ ही जीता है।

भगवद्गीता 3.16 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।