भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 39 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 4.39 · श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

śraddhāvām̐llabhate jñānaṃ tatparaḥ saṃyatendriyaḥ |
jñānaṃ labdhvā parāṃ śāntimacireṇādhigacchati ||

हिन्दी अनुवाद

श्रद्धावान, ज्ञान में तत्पर और इन्द्रियों को वश में रखने वाला व्यक्ति ज्ञान पाता है; और ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शांति प्राप्त कर लेता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 4.39 का अर्थ क्या है?

श्रद्धावान, ज्ञान में तत्पर और इन्द्रियों को वश में रखने वाला व्यक्ति ज्ञान पाता है; और ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शांति प्राप्त कर लेता है।

भगवद्गीता 4.39 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।