भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 28 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.28 · द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥
dravyayajñāstapoyajñā yogayajñāstathāpare |
svādhyāyajñānayajñāśca yatayaḥ saṃśitavratāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
कुछ लोग धन का यज्ञ करते हैं, कुछ तप का, कुछ योग का; और कठोर व्रत धारण करने वाले यत्नशील साधक स्वाध्याय और ज्ञान का यज्ञ करते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.28 का अर्थ क्या है?
कुछ लोग धन का यज्ञ करते हैं, कुछ तप का, कुछ योग का; और कठोर व्रत धारण करने वाले यत्नशील साधक स्वाध्याय और ज्ञान का यज्ञ करते हैं।
भगवद्गीता 4.28 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।