भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 18 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.18 · कर्मण्यकर्म यः च कर्म यः
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
karmaṇyakarma yaḥ paśyedakarmaṇi ca karma yaḥ |
sa buddhimānmanuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt ||
हिन्दी अनुवाद
जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी है और सारे कर्मों को पूर्ण करने वाला है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.18 का अर्थ क्या है?
जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी है और सारे कर्मों को पूर्ण करने वाला है।
भगवद्गीता 4.18 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।