भगवद्गीता · अध्याय 8 / 18

अक्षरब्रह्मयोग — अक्षर ब्रह्म योग

28 श्लोक

अध्याय का सार

अर्जुन ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म और अधिभूत के बारे में पूछते हैं। कृष्ण बताते हैं कि मृत्यु के समय मनुष्य जिसका स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है, इसलिए सदा उनका स्मरण करते हुए कर्तव्य करना चाहिए।

सभी 28 श्लोक

  1. 8.1 · अर्जुन

    किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
    अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥

    kiṃ tadbrahma kimadhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottama |
    adhibhūtaṃ ca kiṃ proktamadhidaivaṃ kimucyate ||

    अर्जुन बोले: हे पुरुषोत्तम, वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है, और कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है, और अधिदैव किसे कहते हैं?

  2. 8.2 · अर्जुन

    अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
    प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥

    adhiyajñaḥ kathaṃ ko’tra dehe’sminmadhusūdana |
    prayāṇakāle ca kathaṃ jñeyo’si niyatātmabhiḥ ||

    हे मधुसूदन, इस देह में अधियज्ञ कौन है और वह इसमें किस प्रकार रहता है? और जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है, वे प्रयाण के समय आपको कैसे जानते हैं?

  3. 8.3 · श्रीकृष्ण

    अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
    भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥

    akṣaraṃ brahma paramaṃ svabhāvo’dhyātmamucyate |
    bhūtabhāvodbhavakaro visargaḥ karmasaṃjñitaḥ ||

    श्रीभगवान बोले: परम अविनाशी तत्त्व ब्रह्म है। उसका अपना स्वभाव अध्यात्म कहलाता है। जिस सृजनात्मक अर्पण से प्राणियों का अस्तित्व उत्पन्न होता है, उसे कर्म कहा जाता है।

  4. 8.4 · श्रीकृष्ण

    अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
    अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥

    adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam |
    adhiyajño’hamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara ||

    हे देहधारियों में श्रेष्ठ, नश्वर भौतिक सत्ता अधिभूत है; विराट पुरुष अधिदैव है; और इस देह में अधियज्ञ स्वयं मैं ही हूँ।

  5. 8.5 · श्रीकृष्ण

    अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
    यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

    antakāle ca māmeva smaranmuktvā kalevaram |
    yaḥ prayāti sa madbhāvaṃ yāti nāstyatra saṃśayaḥ ||

    जो अन्तकाल में केवल मुझे स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है — इसमें कोई संशय नहीं।

  6. 8.6 · श्रीकृष्ण

    यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
    तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

    yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram |
    taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ ||

    हे कुन्तीपुत्र, मनुष्य अन्त समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उसी भाव को वह प्राप्त होता है, क्योंकि जीवन भर वह उसी भाव में रँगा रहा होता है।

  7. 8.7 · श्रीकृष्ण

    तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
    मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥

    tasmātsarveṣu kāleṣu māmanusmara yudhya ca |
    mayyarpitamanobuddhirmāmevaiṣyasyasaṃśayam ||

    इसलिए हर समय मुझे स्मरण करो और युद्ध भी करो। मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर देने पर तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त होगे।

  8. 8.8 · श्रीकृष्ण

    अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
    परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥

    abhyāsayogayuktena cetasā nānyagāminā |
    paramaṃ puruṣaṃ divyaṃ yāti pārthānucintayan ||

    हे पार्थ, अभ्यास-योग से अनुशासित और कहीं और न भटकने वाले मन से निरन्तर ध्यान करता हुआ मनुष्य उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

  9. 8.9 · श्रीकृष्ण

    कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
    सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥

    kaviṃ purāṇamanuśāsitāramaṇoraṇīyāṃsamanusmaredyaḥ |
    sarvasya dhātāramacintyarūpamādityavarṇaṃ tamasaḥ parastāt ||

    जो उस सर्वज्ञ, अनादि, सबके शासक, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबके धारणकर्ता, अचिन्त्य रूप वाले, सूर्य के समान प्रकाशमान और अन्धकार से परे परमात्मा का ध्यान करता है —

  10. 8.10 · श्रीकृष्ण

    प्रयाणकाले मनसाचलेन
    भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
    भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
    स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥

    prayāṇakāle manasācalena
    bhaktyā yukto yogabalena caiva |
    bhruvormadhye prāṇamāveśya samyak
    sa taṃ paraṃ puruṣamupaiti divyam ||

    — और प्रयाण के समय अचल मन से, भक्ति और योग-बल से युक्त होकर, प्राण को भौंहों के बीच भली-भाँति स्थापित कर देता है, वह उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

  11. 8.11 · श्रीकृष्ण

    यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
    विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
    यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
    तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥

    yadakṣaraṃ vedavido vadanti
    viśanti yadyatayo vītarāgāḥ |
    yadicchanto brahmacaryaṃ caranti
    tatte padaṃ saṃgraheṇa pravakṣye ||

    वेद को जानने वाले जिसे अक्षर कहते हैं, आसक्ति से मुक्त संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसे पाने की इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस पद का वर्णन मैं तुमसे संक्षेप में करूँगा।

  12. 8.12 · श्रीकृष्ण

    सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
    मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥

    sarvadvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca |
    mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇamāsthito yogadhāraṇām ||

    शरीर के सब द्वारों को रोककर, मन को हृदय में ठहराकर, प्राण को मस्तक में स्थापित करके और योग-धारणा में स्थिर होकर —

  13. 8.13 · श्रीकृष्ण

    ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
    यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥

    omityekākṣaraṃ brahma vyāharanmāmanusmaran |
    yaḥ prayāti tyajandehaṃ sa yāti paramāṃ gatim ||

    — जो ब्रह्म-स्वरूप एकाक्षर ॐ का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

  14. 8.14 · श्रीकृष्ण

    अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
    तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥

    ananyacetāḥ satataṃ yo māṃ smarati nityaśaḥ |
    tasyāhaṃ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yoginaḥ ||

    हे पार्थ, जो अनन्य चित्त से प्रतिदिन निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस सदा मुझसे जुड़े हुए योगी के लिए मैं सहज ही सुलभ हूँ।

  15. 8.15 · श्रीकृष्ण

    मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
    नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥

    māmupetya punarjanma duḥkhālayamaśāśvatam |
    nāpnuvanti mahātmānaḥ saṃsiddhiṃ paramāṃ gatāḥ ||

    मुझे पाकर परम सिद्धि तक पहुँचे हुए ये महात्मा फिर उस पुनर्जन्म में नहीं लौटते, जो दुःखों का घर है और क्षणभंगुर है।

  16. 8.16 · श्रीकृष्ण

    आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
    मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥

    ābrahmabhuvanāllokāḥ punarāvartino’rjuna |
    māmupetya tu kaunteya punarjanma na vidyate ||

    हे अर्जुन, ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं, अर्थात् वहाँ से लौटना पड़ता है; किन्तु हे कुन्तीपुत्र, मुझे प्राप्त कर लेने पर फिर जन्म नहीं होता।

  17. 8.17 · श्रीकृष्ण

    सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
    रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥

    sahasrayugaparyantamaharyadbrahmaṇo viduḥ |
    rātriṃ yugasahasrāntāṃ te’horātravido janāḥ ||

    जो जानते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन एक हजार युगों का होता है और उसकी रात भी एक हजार युगों पर ही समाप्त होती है, वे लोग दिन और रात का सच्चा रहस्य जानते हैं।

  18. 8.18 · श्रीकृष्ण

    अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
    रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥

    avyaktādvyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyaharāgame |
    rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake ||

    ब्रह्मा का दिन आरम्भ होते ही अव्यक्त से सब व्यक्त पदार्थ प्रकट होते हैं, और रात आने पर वे उसी अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं।

  19. 8.19 · श्रीकृष्ण

    भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
    रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥

    bhūtagrāmaḥ sa evāyaṃ bhūtvā bhūtvā pralīyate |
    rātryāgame’vaśaḥ pārtha prabhavatyaharāgame ||

    हे पार्थ, यही प्राणी-समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर रात आने पर विवश होकर लीन हो जाता है, और दिन आने पर फिर प्रकट होता है।

  20. 8.20 · श्रीकृष्ण

    परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
    यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥

    parastasmāttu bhāvo’nyo’vyakto’vyaktātsanātanaḥ |
    yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyati ||

    किन्तु उस अव्यक्त से भी परे एक और सनातन अव्यक्त सत्ता है, जो सब प्राणियों के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होती।

  21. 8.21 · श्रीकृष्ण

    अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
    यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

    avyakto’kṣara ityuktastamāhuḥ paramāṃ gatim |
    yaṃ prāpya na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||

    उसी अव्यक्त को अक्षर कहा गया है और उसे ही परम गति बताया गया है। जिसे पाकर फिर कोई लौटता नहीं, वही मेरा परम धाम है।

  22. 8.22 · श्रीकृष्ण

    पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
    यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

    puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā |
    yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvamidaṃ tatam ||

    हे पार्थ, जिसके भीतर सब प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है।

  23. 8.23 · श्रीकृष्ण

    यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
    प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥

    yatra kāle tvanāvṛttimāvṛttiṃ caiva yoginaḥ |
    prayātā yānti taṃ kālaṃ vakṣyāmi bharatarṣabha ||

    हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं तुम्हें वह काल बताता हूँ जिसमें शरीर छोड़कर योगी लौटकर नहीं आते, और वह भी जिसमें जाकर वे लौट आते हैं।

  24. 8.24 · श्रीकृष्ण

    अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
    तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥

    agnirjyotirahaḥ śuklaḥ ṣaṇmāsā uttarāyaṇam |
    tatra prayātā gacchanti brahma brahmavido janāḥ ||

    अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने — इस मार्ग से प्रयाण करने वाले ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

  25. 8.25 · श्रीकृष्ण

    धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
    तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥

    dhūmo rātristathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam |
    tatra cāndramasaṃ jyotiryogī prāpya nivartate ||

    धुआँ, रात, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने — इस मार्ग से जाने वाला योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर फिर लौट आता है।

  26. 8.26 · श्रीकृष्ण

    शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
    एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥

    śuklakṛṣṇe gatī hyete jagataḥ śāśvate mate |
    ekayā yātyanāvṛttimanyayāvartate punaḥ ||

    जगत के ये दो मार्ग — शुक्ल और कृष्ण — सनातन माने गए हैं। एक से जाने वाला लौटता नहीं, और दूसरे से जाने वाला फिर लौट आता है।

  27. 8.27 · श्रीकृष्ण

    नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
    तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥

    naite sṛtī pārtha jānanyogī muhyati kaścana |
    tasmātsarveṣu kāleṣu yogayukto bhavārjuna ||

    हे पार्थ, इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोह में नहीं पड़ता। इसलिए हे अर्जुन, तुम हर समय योग में स्थिर रहो।

  28. 8.28 · श्रीकृष्ण

    वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
    दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
    अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
    योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥

    vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva
    dāneṣu yat puṇyaphalaṃ pradiṣṭam |
    atyeti tatsarvamidaṃ viditvā
    yogī paraṃ sthānamupaiti cādyam ||

    वेदों के अध्ययन, यज्ञ, तप और दान का जो भी पुण्य-फल बताया गया है, इस रहस्य को जानने वाला योगी उस सबसे आगे निकल जाता है और सनातन परम धाम को प्राप्त होता है।

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