भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 2 · अर्जुन
भगवद्गीता 8.2 · अधियज्ञः कथं कोऽत्र
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
adhiyajñaḥ kathaṃ ko’tra dehe’sminmadhusūdana |
prayāṇakāle ca kathaṃ jñeyo’si niyatātmabhiḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हे मधुसूदन, इस देह में अधियज्ञ कौन है और वह इसमें किस प्रकार रहता है? और जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है, वे प्रयाण के समय आपको कैसे जानते हैं?
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 8.2 का अर्थ क्या है?
हे मधुसूदन, इस देह में अधियज्ञ कौन है और वह इसमें किस प्रकार रहता है? और जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है, वे प्रयाण के समय आपको कैसे जानते हैं?
भगवद्गीता 8.2 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।