भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 8.4 · अधिभूतं क्षरो भावः

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥

adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam |
adhiyajño’hamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara ||

हिन्दी अनुवाद

हे देहधारियों में श्रेष्ठ, नश्वर भौतिक सत्ता अधिभूत है; विराट पुरुष अधिदैव है; और इस देह में अधियज्ञ स्वयं मैं ही हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 8.4 का अर्थ क्या है?

हे देहधारियों में श्रेष्ठ, नश्वर भौतिक सत्ता अधिभूत है; विराट पुरुष अधिदैव है; और इस देह में अधियज्ञ स्वयं मैं ही हूँ।

भगवद्गीता 8.4 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।