भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 14 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 8.14 · अनन्यचेताः सततं यो मां
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥
ananyacetāḥ satataṃ yo māṃ smarati nityaśaḥ |
tasyāhaṃ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yoginaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ, जो अनन्य चित्त से प्रतिदिन निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस सदा मुझसे जुड़े हुए योगी के लिए मैं सहज ही सुलभ हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 8.14 का अर्थ क्या है?
हे पार्थ, जो अनन्य चित्त से प्रतिदिन निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस सदा मुझसे जुड़े हुए योगी के लिए मैं सहज ही सुलभ हूँ।
भगवद्गीता 8.14 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।