भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 8.12 · सर्वद्वाराणि संयम्य मनो
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
sarvadvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca |
mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇamāsthito yogadhāraṇām ||
हिन्दी अनुवाद
शरीर के सब द्वारों को रोककर, मन को हृदय में ठहराकर, प्राण को मस्तक में स्थापित करके और योग-धारणा में स्थिर होकर —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 8.12 का अर्थ क्या है?
शरीर के सब द्वारों को रोककर, मन को हृदय में ठहराकर, प्राण को मस्तक में स्थापित करके और योग-धारणा में स्थिर होकर —
भगवद्गीता 8.12 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।