भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 8.6 · यं यं वापि स्मरन्भावं

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram |
taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र, मनुष्य अन्त समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उसी भाव को वह प्राप्त होता है, क्योंकि जीवन भर वह उसी भाव में रँगा रहा होता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 8.6 का अर्थ क्या है?

हे कुन्तीपुत्र, मनुष्य अन्त समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उसी भाव को वह प्राप्त होता है, क्योंकि जीवन भर वह उसी भाव में रँगा रहा होता है।

भगवद्गीता 8.6 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।