भगवद्गीता · अध्याय 16 / 18
दैवासुरसम्पद्विभागयोग — दैवासुर संपद विभाग योग
24 श्लोक
अध्याय का सार
कृष्ण दैवी गुणों — निर्भयता, शुद्धता, दान, संयम, सत्य, करुणा — और आसुरी गुणों — दंभ, क्रोध, अहंकार, कठोरता — का भेद बताते हैं। काम, क्रोध और लोभ को नरक के तीन द्वार कहकर वे शास्त्र के अनुसार चलने की प्रेरणा देते हैं।
सभी 24 श्लोक
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16.1 · श्रीकृष्ण
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥abhayaṃ sattvasaṃśuddhirjñānayogavyavasthitiḥ |
dānaṃ damaśca yajñaśca svādhyāyastapa ārjavam ||श्रीभगवान बोले: निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रियों का संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता —
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16.2 · श्रीकृष्ण
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ahiṃsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam |
dayā bhūteṣvaloluptvaṃ mārdavaṃ hrīracāpalam ||— अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शान्ति, किसी की चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लालच न होना, कोमलता, लज्जा और चंचलता का अभाव —
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16.3 · श्रीकृष्ण
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā |
bhavanti saṃpadaṃ daivīmabhijātasya bhārata ||— तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से वैर न रखना और अत्यधिक मान न चाहना — हे भारत, ये दैवी सम्पदा लेकर जन्मे मनुष्य के लक्षण हैं।
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16.4 · श्रीकृष्ण
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥dambho darpo’bhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca |
ajñānaṃ cābhijātasya pārtha saṃpadamāsurīm ||हे पार्थ, दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान — ये आसुरी सम्पदा लेकर जन्मे मनुष्य के लक्षण हैं।
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16.5 · श्रीकृष्ण
दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥daivī saṃpadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā |
mā śucaḥ saṃpadaṃ daivīmabhijāto’si pāṇḍava ||दैवी सम्पदा मुक्ति की ओर ले जाती है और आसुरी सम्पदा बन्धन की ओर। हे पाण्डुपुत्र, शोक मत करो; तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो।
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16.6 · श्रीकृष्ण
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥dvau bhūtasargau loke’smindaiva āsura eva ca |
daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śṛṇu ||हे पार्थ, इस संसार में प्राणियों की दो प्रकार की सृष्टि है — दैवी और आसुरी। दैवी का विस्तार से वर्णन हो चुका; अब आसुरी के बारे में मुझसे सुनो।
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16.7 · श्रीकृष्ण
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca janā na vidurāsurāḥ |
na śaucaṃ nāpi cācāro na satyaṃ teṣu vidyate ||आसुरी स्वभाव के लोग नहीं जानते कि किसमें लगना है और किससे हटना है। उनमें न पवित्रता होती है, न सदाचार, न सत्य।
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16.8 · श्रीकृष्ण
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥asatyamapratiṣṭhaṃ te jagadāhuranīśvaram |
aparasparasaṃbhūtaṃ kimanyatkāmahaitukam ||वे कहते हैं कि यह जगत असत्य है, इसका कोई आधार नहीं, कोई ईश्वर नहीं; यह किसी क्रम से नहीं बना, केवल काम-वासना से उपजा है — इसके सिवा और क्या?
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16.9 · श्रीकृष्ण
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥etāṃ dṛṣṭimavaṣṭabhya naṣṭātmāno’lpabuddhayaḥ |
prabhavantyugrakarmāṇaḥ kṣayāya jagato’hitāḥ ||इसी दृष्टि को पकड़कर, अपने आप को खो चुके, थोड़ी बुद्धि वाले और क्रूर कर्म करने वाले ये लोग संसार के शत्रु बनकर उसके विनाश के लिए उठ खड़े होते हैं।
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16.10 · श्रीकृष्ण
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥kāmamāśritya duṣpūraṃ dambhamānamadānvitāḥ |
mohādgṛhītvāsadgrāhānpravartante’śucivratāḥ ||कभी न भरने वाली कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से भरे हुए, मोह के कारण झूठी धारणाएँ पकड़कर, वे अपवित्र संकल्पों के साथ कर्मों में लगते हैं।
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16.11 · श्रीकृष्ण
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥cintāmaparimeyāṃ ca pralayāntāmupāśritāḥ |
kāmopabhogaparamā etāvaditi niścitāḥ ||मृत्यु तक चलने वाली अनगिनत चिन्ताओं में डूबे हुए, कामनाओं की पूर्ति को ही सबसे बड़ा लक्ष्य मानते हुए, और यह निश्चय किए हुए कि बस यही सब कुछ है —
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16.12 · श्रीकृष्ण
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥āśāpāśaśatairbaddhāḥ kāmakrodhaparāyaṇāḥ |
īhante kāmabhogārthamanyāyenārthasañcayān ||— आशा की सैकड़ों रस्सियों से बँधे, काम और क्रोध के वश में पड़े हुए, वे भोगों की पूर्ति के लिए अन्याय से धन जमा करने का प्रयत्न करते हैं।
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16.13 · श्रीकृष्ण
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥idamadya mayā labdhamimaṃ prāpsye manoratham |
idamastīdamapi me bhaviṣyati punardhanam ||वे सोचते हैं: “आज मैंने यह पा लिया, अब यह इच्छा पूरी करूँगा। यह धन मेरा है, और आगे यह भी मेरा हो जाएगा।
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16.14 · श्रीकृष्ण
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥asau mayā hataḥ śatrurhaniṣye cāparānapi |
īśvaro’hamahaṃ bhogī siddho’haṃ balavānsukhī ||उस शत्रु को मैंने मार दिया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगने वाला हूँ; मैं सफल हूँ, बलवान हूँ और सुखी हूँ।
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16.15 · श्रीकृष्ण
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥āḍhyo’bhijanavānasmi ko’nyo’sti sadṛśo mayā |
yakṣye dāsyāmi modiṣya ityajñānavimohitāḥ ||मैं धनवान हूँ, ऊँचे कुल का हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा।” इस प्रकार अज्ञान से मोहित हुए —
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16.16 · श्रीकृष्ण
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥anekacittavibhrāntā mohajālasamāvṛtāḥ |
prasaktāḥ kāmabhogeṣu patanti narake’śucau ||— अनेक विचारों में भटके हुए, मोह के जाल में फँसे और भोगों में डूबे हुए वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।
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16.17 · श्रीकृष्ण
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ātmasaṃbhāvitāḥ stabdhā dhanamānamadānvitāḥ |
yajante nāmayajñaiste dambhenāvidhipūrvakam ||अपने को ही बड़ा मानने वाले, अकड़ में रहने वाले, धन और मान के मद में चूर वे लोग दम्भ से, विधि की परवाह किए बिना, केवल नाम के लिए यज्ञ करते हैं।
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16.18 · श्रीकृष्ण
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ |
māmātmaparadeheṣu pradviṣanto’bhyasūyakāḥ ||अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध के आश्रित ये ईर्ष्यालु लोग अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं।
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16.19 · श्रीकृष्ण
तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥tānahaṃ dviṣataḥ krurānsaṃsāreṣu narādhamān |
kṣipāmyajasramaśubhānāsurīṣveva yoniṣu ||उन द्वेष करने वाले, क्रूर और मनुष्यों में सबसे अधम अशुभ लोगों को मैं संसार के चक्र में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।
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16.20 · श्रीकृष्ण
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥āsurīṃ yonimāpannā mūḍhā janmani janmani |
māmaprāpyaiva kaunteya tato yāntyadhamāṃ gatim ||हे कुन्तीपुत्र, आसुरी योनियों में पड़कर, जन्म-जन्म में मोहित रहते हुए, वे मुझे नहीं पाते, और उससे भी नीची गति में चले जाते हैं।
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16.21 · श्रीकृष्ण
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥trividhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanamātmanaḥ |
kāmaḥ krodhastathā lobhastasmādetattrayaṃ tyajet ||काम, क्रोध और लोभ — ये नरक के तीन द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।
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16.22 · श्रीकृष्ण
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥etairvimuktaḥ kaunteya tamodvāraistribhirnaraḥ |
ācaratyātmanaḥ śreyastato yāti parāṃ gatim ||हे कुन्तीपुत्र, अन्धकार के इन तीन द्वारों से छूटा हुआ मनुष्य वही करता है जो उसके लिए सचमुच कल्याणकारी है, और इस प्रकार परम गति को पाता है।
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16.23 · श्रीकृष्ण
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥yaḥ śāstravidhimutsṛjya vartate kāmakārataḥ |
na sa siddhimavāpnoti na sukhaṃ na parāṃ gatim ||जो शास्त्र के विधान को छोड़कर अपनी इच्छा के अनुसार चलता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।
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16.24 · श्रीकृष्ण
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥tasmācchāstraṃ pramāṇaṃ te kāryākāryavyavasthitau |
jñātvā śāstravidhānoktaṃ karma kartumihārhasi ||इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसके निर्णय में शास्त्र को ही प्रमाण मानो। शास्त्र के विधान को जानकर तुम्हें इस संसार में अपना कर्म करना चाहिए।