भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 2 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 16.2 · अहिंसा शान्तिरपैशुनम्

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

ahiṃsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam |
dayā bhūteṣvaloluptvaṃ mārdavaṃ hrīracāpalam ||

हिन्दी अनुवाद

— अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शान्ति, किसी की चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लालच न होना, कोमलता, लज्जा और चंचलता का अभाव —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 16.2 का अर्थ क्या है?

— अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शान्ति, किसी की चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लालच न होना, कोमलता, लज्जा और चंचलता का अभाव —

भगवद्गीता 16.2 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।