भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 16.5 · दैवी संपद्विमोक्षाय मता

दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥

daivī saṃpadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā |
mā śucaḥ saṃpadaṃ daivīmabhijāto’si pāṇḍava ||

हिन्दी अनुवाद

दैवी सम्पदा मुक्ति की ओर ले जाती है और आसुरी सम्पदा बन्धन की ओर। हे पाण्डुपुत्र, शोक मत करो; तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 16.5 का अर्थ क्या है?

दैवी सम्पदा मुक्ति की ओर ले जाती है और आसुरी सम्पदा बन्धन की ओर। हे पाण्डुपुत्र, शोक मत करो; तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो।

भगवद्गीता 16.5 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।