भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 16.17 · आत्मसंभाविताः स्तब्धा
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥
ātmasaṃbhāvitāḥ stabdhā dhanamānamadānvitāḥ |
yajante nāmayajñaiste dambhenāvidhipūrvakam ||
हिन्दी अनुवाद
अपने को ही बड़ा मानने वाले, अकड़ में रहने वाले, धन और मान के मद में चूर वे लोग दम्भ से, विधि की परवाह किए बिना, केवल नाम के लिए यज्ञ करते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 16.17 का अर्थ क्या है?
अपने को ही बड़ा मानने वाले, अकड़ में रहने वाले, धन और मान के मद में चूर वे लोग दम्भ से, विधि की परवाह किए बिना, केवल नाम के लिए यज्ञ करते हैं।
भगवद्गीता 16.17 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।