भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 16.15 · आढ्योऽभिजनवानस्मि सदृशो
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
āḍhyo’bhijanavānasmi ko’nyo’sti sadṛśo mayā |
yakṣye dāsyāmi modiṣya ityajñānavimohitāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
मैं धनवान हूँ, ऊँचे कुल का हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा।” इस प्रकार अज्ञान से मोहित हुए —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 16.15 का अर्थ क्या है?
मैं धनवान हूँ, ऊँचे कुल का हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा।” इस प्रकार अज्ञान से मोहित हुए —
भगवद्गीता 16.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।