भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 14 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 16.14 · असौ मया हतः चापरानपि
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
asau mayā hataḥ śatrurhaniṣye cāparānapi |
īśvaro’hamahaṃ bhogī siddho’haṃ balavānsukhī ||
हिन्दी अनुवाद
उस शत्रु को मैंने मार दिया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगने वाला हूँ; मैं सफल हूँ, बलवान हूँ और सुखी हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 16.14 का अर्थ क्या है?
उस शत्रु को मैंने मार दिया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगने वाला हूँ; मैं सफल हूँ, बलवान हूँ और सुखी हूँ।
भगवद्गीता 16.14 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।