भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.5 · अपरेयमितस्त्वन्यां मे
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
apareyamitastvanyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām |
jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat ||
हिन्दी अनुवाद
यह मेरी निचली (अपरा) प्रकृति है। हे महाबाहो, इससे भिन्न मेरी एक और उच्चतर (परा) प्रकृति को जानो — वह चेतन जीव-तत्त्व, जिससे यह सारा जगत धारण किया जाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.5 का अर्थ क्या है?
यह मेरी निचली (अपरा) प्रकृति है। हे महाबाहो, इससे भिन्न मेरी एक और उच्चतर (परा) प्रकृति को जानो — वह चेतन जीव-तत्त्व, जिससे यह सारा जगत धारण किया जाता है।
भगवद्गीता 7.5 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।