भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.4 · भूमिरापोऽनलो वायुः खं च
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
bhūmirāpo’nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhireva ca |
ahaṃkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtiraṣṭadhā ||
हिन्दी अनुवाद
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — ये आठ मेरी प्रकृति के भाग हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.4 का अर्थ क्या है?
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — ये आठ मेरी प्रकृति के भाग हैं।
भगवद्गीता 7.4 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।