भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 24 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.24 · अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
avyaktaṃ vyaktimāpannaṃ manyante māmabuddhayaḥ |
paraṃ bhāvamajānanto mamāvyayamanuttamam ||
हिन्दी अनुवाद
नासमझ लोग मेरे सर्वोच्च, अविनाशी और अनुपम स्वरूप को न जानकर, मुझ अव्यक्त को ऐसा मान लेते हैं मानो मैंने केवल कोई व्यक्त रूप धारण कर लिया हो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.24 का अर्थ क्या है?
नासमझ लोग मेरे सर्वोच्च, अविनाशी और अनुपम स्वरूप को न जानकर, मुझ अव्यक्त को ऐसा मान लेते हैं मानो मैंने केवल कोई व्यक्त रूप धारण कर लिया हो।
भगवद्गीता 7.24 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।