भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 18 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.18 · उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥
udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam |
āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṃ gatim ||
हिन्दी अनुवाद
ये सभी उदार हैं, किन्तु ज्ञानी को तो मैं अपना ही स्वरूप मानता हूँ; क्योंकि योग में स्थिर मन वाला वह मुझे ही सर्वोच्च लक्ष्य मानकर मुझमें टिका रहता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.18 का अर्थ क्या है?
ये सभी उदार हैं, किन्तु ज्ञानी को तो मैं अपना ही स्वरूप मानता हूँ; क्योंकि योग में स्थिर मन वाला वह मुझे ही सर्वोच्च लक्ष्य मानकर मुझमें टिका रहता है।
भगवद्गीता 7.18 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।