भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 7.17 · तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥

teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate |
priyo hi jñānino’tyarthamahaṃ sa ca mama priyaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

इनमें वह ज्ञानी सबसे श्रेष्ठ है जो सदा मुझसे जुड़ा रहता है और केवल मुझमें ही भक्ति रखता है। ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 7.17 का अर्थ क्या है?

इनमें वह ज्ञानी सबसे श्रेष्ठ है जो सदा मुझसे जुड़ा रहता है और केवल मुझमें ही भक्ति रखता है। ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

भगवद्गीता 7.17 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।