भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 15.4 · ततः पदं
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ
yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ |
tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye
yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||
हिन्दी अनुवाद
— फिर उस पद की खोज करनी चाहिए जहाँ पहुँचकर कोई लौटता नहीं, इस भाव से कि “मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवाह फैला है।”
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 15.4 का अर्थ क्या है?
— फिर उस पद की खोज करनी चाहिए जहाँ पहुँचकर कोई लौटता नहीं, इस भाव से कि “मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवाह फैला है।”
भगवद्गीता 15.4 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।