भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 15.5 · निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
nirmānamohā jitasaṅgadoṣā
adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ |
dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñai-
rgacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat ||
हिन्दी अनुवाद
जो मान और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो सदा आत्मा में लगे रहते हैं, जिनकी कामनाएँ शान्त हो गई हैं, और जो सुख-दुःख नाम के द्वन्द्वों से छूट गए हैं — ऐसे मोहरहित ज्ञानी उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 15.5 का अर्थ क्या है?
जो मान और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो सदा आत्मा में लगे रहते हैं, जिनकी कामनाएँ शान्त हो गई हैं, और जो सुख-दुःख नाम के द्वन्द्वों से छूट गए हैं — ऐसे मोहरहित ज्ञानी उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
भगवद्गीता 15.5 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।