भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 3 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 15.3 · न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
na rūpamasyeha tathopalabhyate
nānto na cādirna ca saṃpratiṣṭhā |
aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūla-
masaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā ||
हिन्दी अनुवाद
यहाँ उसका असली रूप दिखाई नहीं देता — न उसका अन्त, न आरम्भ, न उसकी नींव। गहरी जमी जड़ों वाले इस अश्वत्थ को वैराग्य के दृढ़ शस्त्र से काटकर —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 15.3 का अर्थ क्या है?
यहाँ उसका असली रूप दिखाई नहीं देता — न उसका अन्त, न आरम्भ, न उसकी नींव। गहरी जमी जड़ों वाले इस अश्वत्थ को वैराग्य के दृढ़ शस्त्र से काटकर —
भगवद्गीता 15.3 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।