भगवद्गीता · अध्याय 14, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 14.7 · रजो रागात्मकं विद्धि

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥

rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam |
tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam ||

हिन्दी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र, रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जो तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। वह देही को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 27 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 14.7 का अर्थ क्या है?

हे कुन्तीपुत्र, रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जो तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। वह देही को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।

भगवद्गीता 14.7 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।