भगवद्गीता · अध्याय 14, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 14.6 · तत्र सत्त्वं
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥
tatra sattvaṃ nirmalatvātprakāśakamanāmayam |
sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha ||
हिन्दी अनुवाद
हे निष्पाप, इनमें सत्त्व निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और विकारों से रहित है। वह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 27 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 14.6 का अर्थ क्या है?
हे निष्पाप, इनमें सत्त्व निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और विकारों से रहित है। वह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
भगवद्गीता 14.6 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।