भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 13.9 · असक्तिरनभिष्वङ्गः

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥

asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu |
nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu ||

हिन्दी अनुवाद

— आसक्ति न रखना, पुत्र, पत्नी, घर आदि से चिपके न रहना, और मनचाही या अनचाही हर परिस्थिति में मन का सदा सम बने रहना —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 13.9 का अर्थ क्या है?

— आसक्ति न रखना, पुत्र, पत्नी, घर आदि से चिपके न रहना, और मनचाही या अनचाही हर परिस्थिति में मन का सदा सम बने रहना —

भगवद्गीता 13.9 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।