भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 10 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 13.10 · मयि चानन्ययोगेन

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥

mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī |
viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadi ||

हिन्दी अनुवाद

— अनन्य योग के द्वारा मुझमें अटल भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की रुचि, और लोगों की भीड़ में मन न लगना —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 13.10 का अर्थ क्या है?

— अनन्य योग के द्वारा मुझमें अटल भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की रुचि, और लोगों की भीड़ में मन न लगना —

भगवद्गीता 13.10 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।