भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 13.8 · इन्द्रियार्थेषु एव च

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥

indriyārtheṣu vairāgyamanahaṃkāra eva ca |
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam ||

हिन्दी अनुवाद

— इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, अहंकार का न होना, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे तथा रोग में छिपे दुःख और दोष को बार-बार स्पष्ट देखना —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 13.8 का अर्थ क्या है?

— इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, अहंकार का न होना, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे तथा रोग में छिपे दुःख और दोष को बार-बार स्पष्ट देखना —

भगवद्गीता 13.8 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।