भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 13.5 · महाभूतान्यहंकारो च

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥

mahābhūtānyahaṃkāro buddhiravyaktameva ca |
indriyāṇi daśaikaṃ ca pañca cendriyagocarāḥ ||

हिन्दी अनुवाद

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त प्रकृति; दस इन्द्रियाँ और एक मन; तथा इन्द्रियों के पाँच विषय —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 13.5 का अर्थ क्या है?

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त प्रकृति; दस इन्द्रियाँ और एक मन; तथा इन्द्रियों के पाँच विषय —

भगवद्गीता 13.5 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।