भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 13.4 · ऋषिभिर्बहुधा गीतं पृथक्
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥
ṛṣibhirbahudhā gītaṃ chandobhirvividhaiḥ pṛthak |
brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitaiḥ ||
हिन्दी अनुवाद
ऋषियों ने इस विषय को अनेक प्रकार से, विविध वैदिक छन्दों में अलग-अलग गाया है, और ब्रह्मसूत्र के उन युक्तिपूर्ण, निश्चित वचनों में भी इसका वर्णन हुआ है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 13.4 का अर्थ क्या है?
ऋषियों ने इस विषय को अनेक प्रकार से, विविध वैदिक छन्दों में अलग-अलग गाया है, और ब्रह्मसूत्र के उन युक्तिपूर्ण, निश्चित वचनों में भी इसका वर्णन हुआ है।
भगवद्गीता 13.4 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।