भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 3 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 12.3 · ये पर्युपासते
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate |
sarvatragamacintyaṃ ca kūṭasthamacalaṃ dhruvam ||
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो उस अक्षर की उपासना करते हैं — जो शब्दों में बताया नहीं जा सकता, अव्यक्त है, सर्वव्यापी है, चिन्तन से परे है, अपरिवर्तनशील है, अचल है और सनातन है —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 12.3 का अर्थ क्या है?
परन्तु जो उस अक्षर की उपासना करते हैं — जो शब्दों में बताया नहीं जा सकता, अव्यक्त है, सर्वव्यापी है, चिन्तन से परे है, अपरिवर्तनशील है, अचल है और सनातन है —
भगवद्गीता 12.3 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।