भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 2 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 12.2 · मय्यावेश्य मनो ये मां

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥

mayyāveśya mano ye māṃ nityayuktā upāsate |
śraddhayā parayopetāste me yuktatamā matāḥ ||

हिन्दी अनुवाद

श्रीभगवान बोले: जो मुझमें मन लगाकर, सदा मुझसे जुड़े रहकर और परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं योगियों में सबसे श्रेष्ठ मानता हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 12.2 का अर्थ क्या है?

श्रीभगवान बोले: जो मुझमें मन लगाकर, सदा मुझसे जुड़े रहकर और परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं योगियों में सबसे श्रेष्ठ मानता हूँ।

भगवद्गीता 12.2 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।