भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 25 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 10.25 · महर्षीणां भृगुरहं
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
maharṣīṇāṃ bhṛgurahaṃ girāmasmyekamakṣaram |
yajñānāṃ japayajño’smi sthāvarāṇāṃ himālayaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में एकाक्षर ॐ; यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ और स्थिर रहने वालों में हिमालय।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 10.25 का अर्थ क्या है?
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में एकाक्षर ॐ; यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ और स्थिर रहने वालों में हिमालय।
भगवद्गीता 10.25 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।