भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 18 · अर्जुन
भगवद्गीता 10.18 · विस्तरेणात्मनो योगं च
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana |
bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me’mṛtam ||
हिन्दी अनुवाद
हे जनार्दन, अपनी योग-शक्ति और विभूतियों का फिर से विस्तार से वर्णन कीजिए; क्योंकि आपके अमृत-जैसे वचन सुनते हुए मेरा मन भरता ही नहीं।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 10.18 का अर्थ क्या है?
हे जनार्दन, अपनी योग-शक्ति और विभूतियों का फिर से विस्तार से वर्णन कीजिए; क्योंकि आपके अमृत-जैसे वचन सुनते हुए मेरा मन भरता ही नहीं।
भगवद्गीता 10.18 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।