भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 17 · अर्जुन

भगवद्गीता 10.17 · कथं विद्यामहं सदा

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥

kathaṃ vidyāmahaṃ yogiṃstvāṃ sadā paricintayan |
keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo’si bhagavanmayā ||

हिन्दी अनुवाद

हे योगेश्वर, निरन्तर आपका चिन्तन करते हुए मैं आपको कैसे जानूँ? और हे भगवन, किन-किन भावों में मैं आपका ध्यान करूँ?

प्रसंग

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 10.17 का अर्थ क्या है?

हे योगेश्वर, निरन्तर आपका चिन्तन करते हुए मैं आपको कैसे जानूँ? और हे भगवन, किन-किन भावों में मैं आपका ध्यान करूँ?

भगवद्गीता 10.17 किसने कहा है?

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।