भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.8 · प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
prakṛtiṃ svāmavaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ |
bhūtagrāmamimaṃ kṛtsnamavaśaṃ prakṛtervaśāt ||
हिन्दी अनुवाद
अपनी प्रकृति को अपने अधीन करके मैं प्रकृति के वश में पड़े इस समस्त प्राणी-समुदाय को बार-बार रचता हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.8 का अर्थ क्या है?
अपनी प्रकृति को अपने अधीन करके मैं प्रकृति के वश में पड़े इस समस्त प्राणी-समुदाय को बार-बार रचता हूँ।
भगवद्गीता 9.8 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।