भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 19 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.19 · तपाम्यहमहं वर्षं च
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca |
amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna ||
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन, मैं ही तपता हूँ; मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। मैं ही अमृत हूँ और मृत्यु भी; सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.19 का अर्थ क्या है?
हे अर्जुन, मैं ही तपता हूँ; मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। मैं ही अमृत हूँ और मृत्यु भी; सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
भगवद्गीता 9.19 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।