भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 10 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.10 · मयाध्यक्षेण प्रकृतिः
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram |
hetunānena kaunteya jagadviparivartate ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, मेरी अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चर और अचर को जन्म देती है; इसी कारण यह संसार-चक्र घूमता रहता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.10 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र, मेरी अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चर और अचर को जन्म देती है; इसी कारण यह संसार-चक्र घूमता रहता है।
भगवद्गीता 9.10 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।