भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 7.8 · रसोऽहमप्सु कौन्तेय

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥

raso’hamapsu kaunteya prabhāsmi śaśisūryayoḥ |
praṇavaḥ sarvavedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu ||

हिन्दी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र, जल में रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ; सब वेदों में ॐकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ मैं ही हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 7.8 का अर्थ क्या है?

हे कुन्तीपुत्र, जल में रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ; सब वेदों में ॐकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ मैं ही हूँ।

भगवद्गीता 7.8 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।