भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.15 · न मां दुष्कृतिनो मूढाः
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
na māṃ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ |
māyayāpahṛtajñānā āsuraṃ bhāvamāśritāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
दुष्कर्म करने वाले, मूढ़ और अधम मनुष्य मेरी शरण नहीं लेते; माया उनकी समझ को हर लेती है और वे आसुरी स्वभाव का सहारा पकड़े रहते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.15 का अर्थ क्या है?
दुष्कर्म करने वाले, मूढ़ और अधम मनुष्य मेरी शरण नहीं लेते; माया उनकी समझ को हर लेती है और वे आसुरी स्वभाव का सहारा पकड़े रहते हैं।
भगवद्गीता 7.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।