भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.9 · प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥
pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi |
indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||
हिन्दी अनुवाद
— बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और मूँदते हुए भी वह यही समझता है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.9 का अर्थ क्या है?
— बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और मूँदते हुए भी वह यही समझता है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं।
भगवद्गीता 5.9 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।