भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.8 · नैव किंचित्करोमीति

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्‌गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥

naiva kiṃcitkaromīti yukto manyeta tattvavit |
paśyañśrṛṇvanspṛśañjighrannaśnan‌gacchansvapañśvasan ||

हिन्दी अनुवाद

तत्त्व को जानने वाला योगी देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, चलते, सोते और साँस लेते हुए भी यही मानता है कि “मैं कुछ भी नहीं करता” —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.8 का अर्थ क्या है?

तत्त्व को जानने वाला योगी देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, चलते, सोते और साँस लेते हुए भी यही मानता है कि “मैं कुछ भी नहीं करता” —

भगवद्गीता 5.8 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।