भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 2 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.2 · संन्यासः कर्मयोगश्च
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥
saṃnyāsaḥ karmayogaśca niḥśreyasakarāvubhau |
tayostu karmasaṃnyāsātkarmayogo viśiṣyate ||
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान बोले: कर्मों का संन्यास और कर्मयोग — दोनों ही परम कल्याण की ओर ले जाते हैं। पर इन दोनों में कर्म-संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.2 का अर्थ क्या है?
श्रीभगवान बोले: कर्मों का संन्यास और कर्मयोग — दोनों ही परम कल्याण की ओर ले जाते हैं। पर इन दोनों में कर्म-संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
भगवद्गीता 5.2 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।