भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 1 · अर्जुन

भगवद्गीता 5.1 · संन्यासं कर्मणां कृष्ण च

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥

saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punaryogaṃ ca śaṃsasi |
yacchreya etayorekaṃ tanme brūhi suniścitam ||

हिन्दी अनुवाद

अर्जुन बोले: हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से श्रेष्ठ हो, वह मुझे बताइए।

प्रसंग

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.1 का अर्थ क्या है?

अर्जुन बोले: हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से श्रेष्ठ हो, वह मुझे बताइए।

भगवद्गीता 5.1 किसने कहा है?

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।