भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.7 · आहारस्त्वपि सर्वस्य भवति

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥

āhārastvapi sarvasya trividho bhavati priyaḥ |
yajñastapastathā dānaṃ teṣāṃ bhedamimaṃ śṛṇu ||

हिन्दी अनुवाद

सबको प्रिय लगने वाला भोजन भी तीन प्रकार का होता है, और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी। इनका यह भेद सुनो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.7 का अर्थ क्या है?

सबको प्रिय लगने वाला भोजन भी तीन प्रकार का होता है, और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी। इनका यह भेद सुनो।

भगवद्गीता 17.7 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।