भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 17.6 · कर्षयन्तः शरीरस्थं
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥
karṣayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmamacetasaḥ |
māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tānviddhyāsuraniścayān ||
हिन्दी अनुवाद
— जो विवेकहीन होकर शरीर में स्थित तत्त्वों को, और शरीर के भीतर रहने वाले मुझको भी कष्ट देते हैं — उन्हें आसुरी निश्चय वाला जानो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 17.6 का अर्थ क्या है?
— जो विवेकहीन होकर शरीर में स्थित तत्त्वों को, और शरीर के भीतर रहने वाले मुझको भी कष्ट देते हैं — उन्हें आसुरी निश्चय वाला जानो।
भगवद्गीता 17.6 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।