भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 3 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.3 · सत्त्वानुरूपा सर्वस्य

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥

sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata |
śraddhāmayo’yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ ||

हिन्दी अनुवाद

हे भारत, हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.3 का अर्थ क्या है?

हे भारत, हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।

भगवद्गीता 17.3 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।